ज़ुल्म-ओ-सितम को उस के न रक्खा हिसाब में

हँस के ही ज़ीस्त काटी है हम ने अज़ाब में

जश्न-ए-फ़िराक़े यार में काटी है ज़िन्दगी
यूँ रायगाँ न लिख मुझे अपनी किताब में

रौशन मिरे मलाल से चेहरा किसी का है
रक्खा किसी ने है मुझे हर-पल अज़ाब में

हसरत-ए-दीद पूरी हो कर्बे जिगर हो कम
तू लाश अपनी भेज दे ख़त के जवाब में

बारात उस की आई जनाज़ा मिरा उठा
मैं था नक़ाब पोश थी वो भी हिजाब में

गुज़रा तिरी गली से तो याद आया यक ब यक
कितनी दफ़ा गुज़रते थे इनसे शबाब में

किस मोड़ लाई आशिक़ी क्या हाल हो गया
खूने जिगर है घुल रहा आँखों के आब में

क़तरा बहा के ले गया घर बार सब मिरा
सैलाब देखे ऐसे भी मैं ने हबाब में

शामो सहर जो वस्ल की करता था ज़िद कभी
बा'द ए फ़िराक़ "हैफ़" वो आया न ख़्वाब में

— Aman Kumar Shaw "Haif"

More by Aman Kumar Shaw "Haif"

Other ghazal from the same pen

See all from Aman Kumar Shaw "Haif" →

Heart Touching Ghar Shayari

Shers of heart touching ghar.

All Heart Touching Ghar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling