जो जीते जी न आए वो अज़ादारी को आएँगे

अभी कुछ लोग मदफ़न पे अदाकारी को आएँगे

मुझे ये रात में भी चैन से सोने नहीं देंगे
कुछ इक हैं ख़्वाब जो नींदों में ग़म-ख़्वारी को आएँगे

यक़ीं गर हो नहीं आवाज़ देकर के ज़रा देखो
मेरे पाले हुए ग़म हैं वफ़ादारी को आएँगे

लहू का एक भी कतरा मेरा ज़ाया' नहीं होगा
हैं मुस्तक़बिल के ग़म बाकी जो ख़ूँ- ख़्वारी को आएँगे

इलाज-ए-ग़म ही बस करते मुझे तुम ने यहाँ देखा
अभी तुम देखना कुछ लोग बीमारी को आएँगे

कहो झुठलाओगे कैसे मेरे अश्कों के सागर को
कयी दरिया हैं जो मेरी तरफ़दारी को आएँगे

हुदूद-ए- ग़म कहा क्या अब भी बाकी है, अभी कुछ लोग
हमारे बा'द भी या'नी ग़ज़ल कारी को आएँगे

मुझे बेबस करेंगे पहले वो मा'ज़ूर होने तक
वो ही फिर ले के बैसाखी मदद-गारी को आएँगे

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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