साहिलों पे डूबने का डर हीं मुझ को खा गया
छोड़ के कश्ती भँवर में इस लिए मैं आ गया
ज़िन्दगी थमती नहीं आग़ाज़ से अंजाम तक
सोच कर ये मैं भी इस के साथ हीं बहता गया
मत पुकारो अब मुझे तुम नाम मेरा ले के यूँ
था दिवाना मैं कभी पर अब तो मैं पगला गया
वक़्त ने लूटी यहाँ सबकी बहारे ज़िन्दगी
सोचता हूँ मैं कि जो मेरा गया तो क्या गया
वक़्त ने उस शाख पे दो फूल रक्खे थे कभी
कश्मकश में वक़्त की वो फूल भी मुरझा गया
खो के सब कुछ ज़ीस्त में मालूम ये मुझ को हुआ
कुछ नहीं खोया है मैं ने और सब कुछ पा गया
सारे रिश्ते सारे नातें क़ाग़ज़ी थे मिट गए
तन्हा आया था जहाँ में और मैं तन्हा गया
कोशिशें तो ख़ूब की मैं ने कि कुछ भी कह सकूँ
ऐन मौक़े' पे मगर आके "अमन" हकला गया















