पिलाओ ख़ूब रिन्दों को करो आबाद मयख़ाना
यहाँ के लोग कहते हैं नहीं अब याद मयख़ाना
सुकूँ मिलता यहाँ आ कर इलाज-ए-ग़म भी होता है
यहाँ पे ग़म के मारों की है हर फ़रियाद मयख़ाना
सिखाया है यहाँ इसने सबक़ हम को ज़माने का
हर इक उस्ताद से बढ़कर है ये उस्ताद मयख़ाना
गरीबों को नहीं फ़ुर्सत यहाँ रोटी कमाने से
अमीरों के ही हाथों की है ये ईजाद मयख़ाना
झलक इक तेरी पाने को यहाँ हर शख़्स आता था
गए तुम छोड़ के जब से हुआ बर्बाद मयख़ाना
फ़िराक़-ए-यार में हम ने "अमन" बस है यही चाहा
रहे आबाद मेरा दिल रहे आबाद मयख़ाना
— Aman Kumar Shaw "Haif"















