नज़रो में सबकी माना कि छोटा सा हो गया

देखा कभी जो माँ ने मैं आला सा हो गया

बे-लौस हीं गुज़र गया महफ़िल से उस के मैं
होना मेरा ये जैसे न होना सा हो गया

इक वक्त-ए-मुख़्तसर मिला मुझ को हयात में
आए अभी जहाँ में कि जाना सा हो गया

ता ज़िन्दगी सज़ा मुझे मिलती रही यहाँ
जैसे किया हो जो यहाँ गुन्हा सा हो गया

जल कर चराग़ बुझ गए उम्र-ए- रवान के
दरिया-ए- रौशनी मेरा सूखा सा हो गया

इतना फ़क़त कहा था कि करता हूँ प्यार मैं
इकरार होता क्या भला झगड़ा सा हो गया

आँखें उधार दी जिसे वक्त-ए- ख़राब में
बारी मेरी जो आई वो अंधा सा हो गया

साक़ी तेरी नज़र का हवाला दूँ क्या बता
देखी तेरी निगाह कि पीना सा हो गया

उस से बिछड़ के ख़ाक में मिलना था तय मेरा
मुझ से बिछड़ के वो भी तो अदना सा हो गया

उस ने कहा जो हँस के कि कैसे हो तुम "अमन"
आँसू बगैर ही तभी रोना सा हो गया

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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Gunaah Shayari

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