jab se vo samandar paar gaya | जब से वो समन्दर पार गया

  - Bekal Utsahi

जब से वो समन्दर पार गया
गोरी ने सँवरना छोड़ दिया

  - Bekal Utsahi

Environment Shayari

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    इसे तो वक़्त की आब-ओ-हवा ही ठीक कर देगी
    मियाँ नासूर होते ज़ख़्म सहलाया नहीं करते
    shaan manral
    बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए
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    Sheikh Ibrahim Zauq
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    Gyan Prakash Akul
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    Shaheen Abbas
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    ये हवा सारे चराग़ों को उड़ा ले जाएगी
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    Naseer Turabi
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    उतरी हुई नदी को समंदर कहेगा कौन
    सत्तर अगर हैं आप बहत्तर कहेगा कौन

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    मैं देखती हूँ आपको शौहर कहेगा कौन
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    Paplu Lucknawi
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    मैं अपनी हिजरत का हाल लगभग बता चुका था सभी को और बस
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    Vikram Gaur Vairagi
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    जिस की हर शाख़ पे राधाएँ मचलती होंगी
    देखना कृष्ण उसी पेड़ के नीचे होंगे
    Bekal Utsahi
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    दिमाग़ अर्श पे है ख़ुद ज़मीं पे चलते हैं
    सफ़र गुमान का है और यक़ीं पे चलते हैं

    हमारे क़ाफ़िला-सलारों के इरादे क्या
    चले तो हाँ पे हैं लेकिन नहीं पे चलते हैं

    न जाने कौन सा नश्शा है उन पे छाया हुआ
    क़दम कहीं पे हैं पड़ते कहीं पे चलते हैं

    बना के उन को अगर छोड़ दो तो गिर जाएँ
    मकाँ नए कि पुराने मकीं पे चलते हैं

    जहाँ तुम्हारा है तुमको किसी का डर क्या है
    तमाम तीर जहाँ के हमीं पे चलते हैं
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    Bekal Utsahi
    जब दिल ने तड़पना छोड़ दिया
    जलवों ने मचलना छोड़ दिया

    पोशाक बहारों ने बदली
    फूलों ने महकना छोड़ दिया

    पिंजरे की सम्त चले पंछी
    शाख़ों ने लचकना छोड़ दिया

    कुछ अबके हुई बरसात ऐसी
    खेतों ने लहकना छोड़ दिया

    जब से वो समन्दर पार गया
    गोरी ने सँवरना छोड़ दिया

    बाहर की कमाई ने बेकल
    अब गाँव में बसना छोड़ दिया
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    Bekal Utsahi
    वो थे जवाब के साहिल पे मुंतज़िर लेकिन
    समय की नाव में मेरा सवाल डूब गया
    Bekal Utsahi
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    बीच सड़क इक लाश पड़ी थी और ये लिक्खा था
    भूक में ज़हरीली रोटी भी मीठी लगती है
    Bekal Utsahi
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