लुत्फ़-ए-दीद अब कोई तेरी तस्वीर-ओ-सूरत में

हुआ मैं बे-असर कुछ इस तरह तेरी नदामत में

ये याद-ए-रफ्तगाँ रंज-ओ-अलम और ये मलाल-ए-ग़म
हमारे साथ ही ये दफ़्न होगें अब तो तुर्बत में

सियह-बख़्ती ये काली रात और ये टूटती साँसें
कहीं मैं मर न जाऊँ ख़ौफ़ से इस तुंद वहशत में

ये तेरी गुल फ़िशानी क़ब्र पे और शोर ये तेरा
मुझे आराम से सोने नहीं देते हैं ख़ल्वत में

जिगर के ज़ख़्म को हम ने कहा है ज़ख़्म शे'रों में
न क़िस्सागोई की हम ने ग़म-ए-दिल की वज़ाहत में

ये दिल शफ़्फ़ाफ़ था कितना फ़क़त मैं ही था जब मुझ
में
मेरी हस्ती कहीं फिर खो गई मेरी कसाफ़त में

उसे देखो उसे परखो अभी भी 'हैफ़' है वो ही
जिसे तुम छोड़ आए थे कभी मरने की हालत में

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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