
बस्ती बस्ती ख़ाक उड़ाये, बस वहशत का मारा हो
उस से इश्क़ की आस न करना जिस का मन बंजारा हो
ख़ुद को शाइ'र कहते रहना दिल को लाख सुकूँ दे दे
लेकिन दुनिया की नज़रों में तुम अब भी आवारा हो
— Daagh Aligarhi
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