आँखें बनाइए कभी दरिया बनाइए

मर्ज़ी हो जैसी आप की वैसा बनाइए

आँखों के नीचे काले जो धब्बे हैं बेशुमार
उन की जगह पे आप जनाज़ा बनाइए

आग़ाज़ पे बनाइए रौशन मेरा मकाँ
अंजाम पे चराग़ों को बुझता बनाइए

दाग़-ए-बदन बनाइए इक इक सलीक़े से
चेहरे को आप मेरे प हँसता बनाइए

तर्ज़-ओ-हुनर का दीजिये कुछ तो सबूत आप
ख़ून-ए-जिगर को आँखों से बहता बनाइए

सब कुछ न डूब जाए कही इस के आब में
आँखों के दरिया को ज़रा उथला बनाइए

सब कुछ उड़ा ले जाएगा तूफां ये वक़्त का
मजबूत दर-दिवार को जितना बनाइए

गुज़रा ज़माना "हैफ़" का वो कहते रहना के
ऐसा बनाइए कभी वैसा बनाइए

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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