"मरता रहा हूँ मैं"
हर रोज़ ज़िन्दगी जीने की कोशिश में
हर रोज़ ख़ुद को पा लेने की ख़्वाहिश में
मरता रहा हूँ मैं
मरता रहा हूँ मैं
न जाने किस सफ़र में हूँ
न जाने कौन सा शहर में हूँ
ज़िन्दगी कश्मकश में गुज़रती है
कहाँ आ कर ज़िन्दगी ये ठहरती है
कहा जाने को था
कहाँ पहूँचा हूँ
कि ख़ुद से ख़ुद की रंजिश में
मरता रहा हूँ मैं
मरता रहा हूँ मैं
कब किसे थी ख़बर हाल ऐसा होगा
दिन, महिना और साल ऐसा होगा
सफ़र ये क्यूँ भला दुश्वार है
ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी के पार है
अनगिनत प्रश्नों के मेले में
पड़ गया हूँ शायद किसी झमेले में
राह नहीं मंजिल नहीं
कश्ती नहीं साहिल नहीं
क़ैद होकर शायद किसी बंदिश में
मरता रहा हूँ मैं
मरता रहा हूँ मैं
हम सफ़र बस ख़याल है
कौन किस के साथ है
बस कहने की बात है
तुम कहती हो कि तुम मेरी हो
मुझ को तुम क्या घेरी हो
मैं ख़ुद भी ख़ुद का हो न सका
कैसे तेरा हो पाऊँगा
यही हक़ीक़त है ज़िन्दगी की
यही अज़ीयत है ज़िन्दगी की
तुम मुझ से नफ़रत करो
बस तुम्हें ये समझाने की कोशिश में
मरता रहा हूँ मैं
मरता रहा हूँ मैं















