"सफ़र ए ज़िन्दगी"
बेशक
मैं ज़वाल हूँ
तेरा ही कमाल हूँ
जो हल कभी न हो सके
मैं ऐसा एक सवाल हूँ
फ़िराक़ हूँ विसाल हूँ
हर सम्त मैं निढ़ाल हूँ
ख़ुद का ही हूँ मैं हम सफ़र
ख़ुद का ही मैं ख़याल हूँ
ऐ ज़िन्दगी मैं क्या कहूँ
मैं क्या पढ़ूं मैं क्या लिखूँ
जो लिख रहा हूँ झूठ है
जो कह रहा हूँ वो सच नहीं
एक राह ए हयात है
एक तवील रात है
सियाह है ये रात भी
अंधेर मेरा घर है
एक रौशनी है चुभ रही
एक तीरगी से रब्त है
वुजूद अपना जानने को
ख़ुद को पहचानने को
फिर रहा हूँ दर ब दर
न जाने राह कौन सी
न जाने किस की चाह है
एक हम सफ़र जो था कभी
एक राहबर जो था कभी
एक ज़िन्दगी जो तब भी थी
एक ज़िन्दगी जो अब भी है
फर्क़ है फर्क़ है
ऐ दोस्त तेरी चाह में
ऐ दोस्त तेरी राह में
फर्क़ है फर्क़ है
तुझे है आरज़ू ए दुनिया
मेरे लिए जो ख़ाक है
तेरा रास्ता है मुख़्तलिफ़
मेरा रास्ता है मुख़्तलिफ़
तुम चाहते हो मैं कहूँ रंजो ग़म दुश्वारियाँ
पर मेरी ख़ामोशी पे मुझ को बहुत ऐतिबार है
तो काम ऐसा करें
तुम छोड़ दो मुझ को मेरे हाल पे
जवाब पे सवाल पे
उम्र के किसी पड़ाव पर जो मैं जो तुझ से मिल गया
इत्तेफ़ाक़ से
तो कह देना ये शख़्स बा कमाल है
पर ऐ हम सफ़र उस वक़्त भी
कहूंगा मैं
जो हल कभी न हो सके
एक ऐसा मैं सवाल हूँ
बेशक
मैं ज़वाल हूँ
कमाल हूँ कमाल हूँ















