बस इक घाव को ही कुरेदा गया है

इसी तरह हम को सताया गया है

सुख़न में हमें लिखना था दर्द अपना
जिगर के लहू को निचोड़ा गया है

क़बा जो उतारूँ बदन गिर पड़ेगा
ये किस हाल में मुझ को छोड़ा गया है

मैं बाज़ार में आख़िरी शय था यारों
घटा कर मेरा दाम बेचा गया है

सर-ए- बज़्म फिर यूँ हुआ के हमी को
हमारा ही क़िस्सा सुनाया गया है

कमी जब भी आई ग़मों की ग़ज़ल में
ज़माने से इनको ख़रीदा गया है

जहाँ भी गए साथ वहशत को ले कर
वहीं से हमें फिर निकाला गया है

ये पलकें यूँ बेवज्ह भारी नहीं हैं
ग़म-ए- ज़ीस्त इनपर ही लादा गया है

कहाँ `हैफ़` ने जी है ये ज़िंदगानी
समझिए कि बस वक़्त काटा गया है

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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