तुम्हारी याद में ज़ख़्मों को छील लेते हैं
हमें तरस ही नहीं आता अपनी हालत पर
हमें तरस ही नहीं आता अपनी हालत पर
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मैं सात साल से अब तक हिसार-ए-इश्क़ में हूँ
वो शख़्स आज भी मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में है
वो शख़्स आज भी मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में है
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हासिल नहीं हुआ है मोहब्बत में कुछ मगर
इतना तो है कि ख़ाक उड़ाना तो आ गया
इतना तो है कि ख़ाक उड़ाना तो आ गया
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नहीं है लब पे दिखावे का भी तबस्सुम अब
हमें किसी ने मुक़म्मल उदास कर दिया है
हमें किसी ने मुक़म्मल उदास कर दिया है
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मुझ पे पड़ती नहीं बलाओं की धूप
सर पे साया-फ़िगन है माँ की दुआ
सर पे साया-फ़िगन है माँ की दुआ
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