हाल-ए-गुलशन
सायों से पूछते चलें
गुलशन का हालचाल
कैसा रहा चमन, कैसी रही बहार?
कैसा रहा निशात के ख़्वाबों का कारोबार?
कैसी रही ज़मीन, कैसा था आसमान?
जो था नहीं क्या याद वो आया था बार बार?
दिल टूटते रहे क्या, या सब भला सा था?
वो मिल सके क्या जिन में कोई मसअला सा था
टूटी दिलों की बर्फ़ या ख़ामोशियाँ रहीं?
सर्दियों के बीच क्या कुछ गरमियाँ रहीं?
कितने गुलों के जिस्म अबके चाक हो गए
हालात ठीक हैं या खौफ़नाक हो गए?
कैसे रहे ये दिन?
कैसा रहा ये साल?
सायों से पूछते चलें
गुलशन का हालचाल
दिल से उसने मुझे निकाल दिया
अब मुझे शायरी में रहने दो
शेर तस्वीर पर लिखा है ना
हाँ इसे डायरी में रहने दो
ये देखना है कौन बचाने की तरफ़ है
पानी तो अभी आग लगाने की तरफ़ है
ख़ुद अपनी ख़िलाफ़त में रहा जिसकी तरफ़ मैं
उस शख़्स को देखें कि ज़माने की तरफ़ है
इस नश्शे में आया था चला तेरी तरफ़ मैं
अब ध्यान मेरा लौट के जाने की तरफ़ है
लिपटी रही हर ख़्वाब से इक सर्द हक़ीक़त
दरिया तो अभी कश्ती डुबाने की तरफ़ है
मैं कहता रहा दिल तेरा मुझसे न लगे पर
और सबको लगा दिल तुझे पाने की तरफ़ है
यारों की ये ज़िद है मुझे तरतीब से रखना
और अपना अमल ख़ाक उड़ाने की तरफ़ है