Sarul

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@sarulbagla

Sarul shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sarul's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

एक तितली ने इश्क़ कर कर के गुल की आदत ख़राब कर दी है — Sarul
बदलता जा रहा है रस्ता दरिया मैं अंदर रेत होता जा रहा हूँ — Sarul
जहान भर में अजब मुहाली पड़ी हुई है किसान तेरी ज़मीन ख़ाली पड़ी हुई है — Sarul
आज छुट्टी है कोई ख़्वाब पढ़ो लेटकर गोद में किताब पढ़ो — Sarul
माली तो अपना बाग़ गुलों से भरा कहे है बात जब ये बात कोई दूसरा कहे — Sarul
दिल-ए-ग़म-गुस्ता तेरी याद से ख़ाली हर शाम भरती जाती है मेरी आँख में लाली हर शाम — Sarul
ख़ुशबू बिखर चली है चलो देख के चलें तेरे उधर चली है चलो देख के चलें — Sarul
तुम को हमीं से चाहिए तफ़सीले-वारदात ज़ालिम से भी तो कोई जवाबात माँगिए — Sarul
घर मुबारक उन्हें जो घर में हैं हम अभी तक तो बस सफ़र में हैं — Sarul
ये क्या चराग़ है सारी फ़ज़ा धुऍं में है चराग़ दो कोई जो रौशनी भी देता हो — Sarul
नहीं ज़रूरी परिंदा है तो क़फ़स में रहे रहे कि जैसे कोई शख़्स दस्तरस में रहे — Sarul
इतना काफ़ी है फूल भेजे हैं बाक़ी तोहफ़े फ़ुज़ूल भेजे हैं — Sarul
किसी ने क्या तुम्हें धोखा दिया है मेरी बाँहों में भी घबरा रहे हो — Sarul
दिन को जो रात बनाते हो चलो आप तो बात बनाते हो चलो — Sarul
मेरे हमराह थोड़ा ध्यान देना नई मुश्किल ज़रा आसान देना — Sarul
सुनी कहानी तो किरदार रो पड़ें सारे ग़ज़ल हुई नहीं अश-आर रो पड़ें सारे — Sarul
सारे किरदार कहानी में परेशानी में ख़्वाब देखें तो मुसव्विर की निगहबानी में — Sarul

Ghazal

ये सब कहने से होता कुछ नहीं है उसे लगता था दुनिया कुछ नहीं है तेरी जानिब से ख़ुद को देखना है तेरी जानिब से दिखना कुछ नहीं है मुझे लगता है दुनिया है मोहब्बत अभी सोचूँगा सोचा कुछ नहीं है मोहब्बत चार दिन की रौशनी है मोहब्बत का भरोसा कुछ नहीं है मेरे बारे में सब सेे पूछ लेना मेरे बारे में अच्छा कुछ नहीं है सभी कहते हैं कोई बात तो है मुझे लगता है ऐसा कुछ नहीं है गुमाँ हस्ती का है तो बद-गुमाँ हूँ कि दरिया सब है क़तरा कुछ नहीं है यही जाना कि जाना कुछ नहीं है यही समझा समझना कुछ नहीं है तुम्हें होना था आख़िर पास मेरे लो मेरे पास होना कुछ नहीं है मेरी आँखों में देखे ग़ौर कर के मेरी आँखों में दिखना कुछ नहीं है तुम्हें आना है मेरी क़ब्र पर भी कि सब चलना है रुकना कुछ नहीं है ज़रा नाशाद तो हैं माहो-अंजुम तबाही है पर उतना कुछ नहीं है तेरी शोख़ी मेरे अश'आर ‘सारुल’ मिटी जानी है बचना कुछ नहीं है — Sarul

Nazm

नज़्म:- मौज-ए-बेहिसी इक बार चलो हम वहाँ चलें कि वक़्त जहाँ ले चलता है अलसा कर सुब्हें उठती है सूरज मर्ज़ी से ढलता है दिन के उजाले को मेरे ख़्वाबों से कोई ऐतराज़ न हो पानी में पत्थर फेकूँ तो नदी जहाँ नाराज़ न हो इल्ज़ाम के फ़िक्रे न फेंके सब लोग मेरी ख़ामोशी पर मसअला-ए-तिजारत न सोचे सब लोग मेरी पा-बोसी पर इक बार चलो हम यूँँ भी करें नदियों को ख़ुद ही बहने दें चेहरे को ज़रा राहत दे दें और जंग-ए-दहर को चलने दें इक बार चलो हम यूँँ भी करें बादल को पानी देने दें रातों को ठण्डी होने दें नींदों के थके दरख़्तों पर अलसाए परिंदे सोने दें जो होता है वो होने दें जो होता है वो होने दें — Sarul