बोलते कुछ तो ख़ामुशी के बाद
कैसा लगता है दिल्लगी के बाद
यूँँ है लगता किसी किसी के बाद
घर नहीं घर है रुख़सती के बाद
यूँँ ही रहते हैं सब उमीद में या
ज़िंदगी है भी ज़िंदगी के बाद
उस सेे मिलकर के हो गईं सदियाँ
वो जो रहता है दो गली के बाद
एक भूले हुए की याद में फिर
दिल दुखाता हूँ मैं ख़ुशी के बाद
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