Sarul
Sarul
Ghazal

आना जाना नहीं कि कम कर लें

ग़म बहाना नहीं कि कम कर लें

ज़ीस्त कटती है रोज़ क़तरों में
ये फ़साना नहीं कि कम कर लें

ये मोहब्बत ही सब मुसीबत थी
वो भी माना नहीं कि कम कर लें

तेरी गलियाँ तवाफ़ बेजा सही
फिर बुलाना नहीं कि कम कर लें

कैफ़ लज़्ज़त में सब मनाज़िर हैं
इतने दाना नहीं कि कम कर लें

— Sarul

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