Sarul
Sarul
Ghazal

वो बस बातों से ही बहला गया है

समझ में माजरा तो आ गया है

उसे सच कहने की आदत नहीं है
जो सच पूछा है तो घबरा गया है

इनायत है नहीं आती किसी को
शिकायत करना सब को आ गया है

मिला था जो मुझे बादे-सबा सा
गया तो रक़्से-जानाँ सा गया है

नई दुनिया का मौसम कुछ अलग है
ये दिल कुछ ख़ुदस उकता सा गया है

बचाए अब ख़ुदा इन रहबरों को
कि क़ातिल का तरीक़ा भा गया है

तमाशा देखने वालो में तुम थे
तो दिल थोड़ा सुकूँ तो पा गया है

— Sarul

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