Sarul
Sarul
Ghazal

ये देखना है कौन बचाने की तरफ़ है

पानी तो अभी आग लगाने की तरफ़ है

ख़ुद अपनी ख़िलाफ़त में रहा जिस की तरफ़ मैं
उस शख़्स को देखें कि ज़माने की तरफ़ है

इस नश्शे में आया था चला तेरी तरफ़ मैं
अब ध्यान मेरा लौट के जाने की तरफ़ है

लिपटी रही हर ख़्वाब से इक सर्द हक़ीक़त
दरिया तो अभी कश्ती डुबाने की तरफ़ है

मैं कहता रहा दिल तेरा मुझ से न लगे पर
और सब को लगा दिल तुझे पाने की तरफ़ है

यारों की ये ज़िद है मुझे तरतीब से रखना
और अपना अमल ख़ाक उड़ाने की तरफ़ है

— Sarul

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