बात करती थी क्या शराफ़त से
उसकी दिलकश अदा नदामत से
फिर से उसका यक़ीन कर भी लिया
बाज़ आता नहीं हूँ आदत से
थी शिकायत मुझे कि तन्हा हूँ
तंग हूँ अब मैं इस शिकायत से
ज़िंदगी का रहा मलाल बहुत
कुछ बनाएँगे अब मलामत से
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Sarul
our suggestion based on Sarul
As you were reading Nazakat Shayari Shayari