Navneet krishna

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@Navneet_krishna

Navneet krishna shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Navneet krishna's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ग़म-ज़दा गीत गुनगुनाना है हाल-ए-दिल आप को सुनाना है — Navneet krishna
उस ने बुलवाया मुझे जाना पड़ा बे-सबब ही मुझ को मुस्काना पड़ा — Navneet krishna
इक इंक़लाब नया आज हो गया है क्या मुझे ज़माने ने ख़ुद ही बदल दिया है क्या — Navneet krishna
अगरचे ये सच है कि कम देखते हैं मुहब्बत से तुझ को जो हम देखते हैं — Navneet krishna
ये दर्द भी वफ़ाओं में यूँँ ढो रहा हूँ मैं तेरे अलावे और का भी हो रहा हूँ मैं — Navneet krishna
वक़्त कब मुझ को आज़माता है वक़्त को मैं ही आज़माता हूँ — Navneet krishna
इंसाँ के ज़मीरों को जला देती है ग़ुर्बत कुछ बात है दर उस का अँधेरे में खुला है — Navneet krishna
मैं वो मजदूर हूँ जो दुनियाँ में झोपड़ी को महल बनाता हूँ — Navneet krishna
खिलते ही नहीं फूल दिल-ओ-जाँ- के हमारे दिल को तेरी उल्फ़त में सदा ज़ख़्म मिला है — Navneet krishna
घुट-घुट के जिए मर न सके हाए रे क़िस्मत इस दौर में जीना भी मेरी जान कला है — Navneet krishna
दिल हमारा तो रेज़ा-रेज़ा है आप क्यूँ तार-तार करते हैं — Navneet krishna
किसी दिन वो सुनेगा भी परायों का सुनाता है — Navneet krishna
तारे नफ़स पर उँगली रख दी छेड़ के तू ने बात ग़ज़ल की नोके क़लम से क़तरा-क़तरा जारी हैं रिशहात ग़ज़ल की — Navneet krishna

Ghazal

Nazm

"बेटियाँ " कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ सहने लगी हैं बेटियाँ माँ - बाप के लिए ही ज़िंदा रहती हैं बेटियाँ पर इन्हीं के हाथों नालियों में बहती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ क्या गुनाह है इनका जो इतना ज़ुल्म सहती हैं बेटियाँ नालियों में ही अक्सर न जाने क्यूँ बहती हैं बेटियाँ अपने ही घरों में क्यूँ मारी जा रही हैं बेटियाँ आज भी और कल भी दर्द की चोट से सिसकती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ न जाने क्यूँ पराई घर में बेची जा रही हैं बेटियाँ दर- बदर भटक रही हैं अक्सर क्यूँ बेटियाँ बेटो के चोट पे भी डराई जाती हैं बेटियाँ और जन्म लेते ही बस ज़िन्दा जलाई जाती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ बेटों के जन्म लेने के कारण आजन्म ही रह जाती हैं बेटियाँ कभी मंदिर में कभी मस्जिद में क्यूँ दबोची जा रही हैं बेटियाँ दर्द को आख़िर क्यूँ दर्द समेट रही हैं आजकल बेटियाँ हर तरह ज़ुल्म-ओ-सितम से सिर्फ़ एक दिन ज़िंदा रहती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ — Navneet krishna
"परिचय ग़रीबी का" चुप-चाप दर्द को समेट कर चेहरे पर मुस्कान ले जाता है घर पर पहुँचकर ,अपने बच्चों के साथ ठेले पर बैठ कर, प्यारी सी मुस्कान देता है कोमल से हाथ को पकड़ कर बाप उस की उँगलियाँ हाथों में ले कर नाख़ून काट कर एक सीध में लाता है इसे डर नहीं घर में चोरी होने का , साँझ ढलते ही वो सो जाता है , ये मेहनत की कमाई करता है , किसी का हक़ नहीं मरता , केवल अपने हक का खाता है , न बँगला है न गाड़ी है , फिर भी पूरा शहर घूम लेता है , न पेट्रोल, न डीज़ल , न कोई ईंधन , चार पहिए के उड़न खटोले पर , प्रकृति से रोमांस करता है, न पोल्यूशन, न गंदगी , स्वच्छता का प्रतीक बना, शहर-का-शहर भ्रमन करता है इस का ठेला ही इस की ज़िन्दगी है , पूजा है, व्रत है, बंदगी है , एक छोटा सा परिवार है , बच्चा ही संसार है , ये मुस्कुराता हुआ चेहरा , साहब ये तो , एक गुपचुप बेचने वाला है, एक ठेला ठेलने वाला है — Navneet krishna