"परिचय ग़रीबी का"

चुप-चाप दर्द को समेट कर
चेहरे पर मुस्कान ले जाता है
घर पर पहुँचकर ,अपने बच्चों के साथ
ठेले पर बैठ कर, प्यारी सी मुस्कान देता है

कोमल से हाथ को पकड़ कर बाप
उस की उँगलियाँ हाथों में ले कर
नाख़ून काट कर एक सीध में लाता है

इसे डर नहीं घर में चोरी होने का ,
साँझ ढलते ही वो सो जाता है ,
ये मेहनत की कमाई करता है ,
किसी का हक़ नहीं मरता ,
केवल अपने हक का खाता है ,
न बँगला है न गाड़ी है ,
फिर भी पूरा शहर घूम लेता है ,
न पेट्रोल, न डीज़ल , न कोई ईंधन ,
चार पहिए के उड़न खटोले पर ,
प्रकृति से रोमांस करता है,
न पोल्यूशन, न गंदगी ,
स्वच्छता का प्रतीक बना,
शहर-का-शहर भ्रमन करता है

इस का ठेला ही इस की ज़िन्दगी है ,
पूजा है, व्रत है, बंदगी है ,
एक छोटा सा परिवार है ,
बच्चा ही संसार है ,
ये मुस्कुराता हुआ चेहरा ,
साहब ये तो ,
एक गुपचुप बेचने वाला है,
एक ठेला ठेलने वाला है

— Navneet krishna

More by Navneet krishna

Other nazm from the same pen

See all from Navneet krishna →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling