"हरियाली मिशन"
कहाँ वो धरती है मेरी जान
थी जिस की हरियाली पहचान
उसे मैं ढूँढ़ता हूँ
हवा में ज़हर घुली है आज
ये पानी में भी मिला है आज
बचाऊँ आज यहाँ पर जा
उसे मैं ढूँढ़ता हूँ
वो सुंदर साया अपने गाँव
जहाँ थी ठंडी -ठंडी छाँव
जहाँ जन्में ये सौर अरमान
उसे मैं ढूँढ़ता हूँ
यहाँ थी कोयलिया की कूक
यहाँ थी बाँसुरिया की फूँक
फ़ज़ा में छाया था सुरतान
उसे मैं ढूँढ़ता हूँ
कहाँ खोया वो हिंदुस्तान
निराली जिस की थी हर-शान
की जिस पर था हम को अभिमान
उसे मैं ढूँढ़ता हूँ
— Navneet krishna















