एक क़िस्सा वफ़ा का सुना दीजिएदर्द-ए-दिल को ज़रा अब बढ़ा दीजिएमेरे अल्ला कब तक शब-ए-हिज्र येमुझ को महबूब से फिर मिला दीजिए— Navneet krishna