"बेटियाँ "

कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ
कुछ नहीं बहुत कुछ सहने लगी हैं बेटियाँ
माँ - बाप के लिए ही ज़िंदा रहती हैं बेटियाँ
पर इन्हीं के हाथों नालियों में बहती हैं बेटियाँ
कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ

क्या गुनाह है इनका
जो इतना ज़ुल्म सहती हैं बेटियाँ
नालियों में ही अक्सर
न जाने क्यूँ बहती हैं बेटियाँ
अपने ही घरों में
क्यूँ मारी जा रही हैं बेटियाँ
आज भी और कल भी
दर्द की चोट से सिसकती हैं बेटियाँ
कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ

न जाने क्यूँ पराई घर में
बेची जा रही हैं बेटियाँ
दर- बदर भटक रही हैं
अक्सर क्यूँ बेटियाँ
बेटो के चोट पे भी
डराई जाती हैं बेटियाँ
और जन्म लेते ही बस
ज़िन्दा जलाई जाती हैं बेटियाँ
कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ

बेटों के जन्म लेने के कारण
आजन्म ही रह जाती हैं बेटियाँ
कभी मंदिर में कभी मस्जिद में
क्यूँ दबोची जा रही हैं बेटियाँ
दर्द को आख़िर क्यूँ दर्द
समेट रही हैं आजकल बेटियाँ
हर तरह ज़ुल्म-ओ-सितम से
सिर्फ़ एक दिन ज़िंदा रहती हैं बेटियाँ
कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ

— Navneet krishna

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