नज़्म:- मौज-ए-बेहिसी
इक बार चलो हम वहाँ चलें
कि वक़्त जहाँ ले चलता है
अलसा कर सुब्हें उठती है
सूरज मर्ज़ी से ढलता है
दिन के उजाले को मेरे
ख़्वाबों से कोई ऐतराज़ न हो
पानी में पत्थर फेकूँ तो
नदी जहाँ नाराज़ न हो
इल्ज़ाम के फ़िक्रे न फेंके
सब लोग मेरी ख़ामोशी पर
मसअला-ए-तिजारत न सोचे
सब लोग मेरी पा-बोसी पर
इक बार चलो हम यूँ भी करें
नदियों को ख़ुद ही बहने दें
चेहरे को ज़रा राहत दे दें
और जंग-ए-दहर को चलने दें
इक बार चलो हम यूँ भी करें
बादल को पानी देने दें
रातों को ठण्डी होने दें
नींदों के थके दरख़्तों पर
अलसाए परिंदे सोने दें
जो होता है वो होने दें
जो होता है वो होने दें















