रक़्स-ए-ग़मगीं
सोचते सोचते ही रात हुई जाती है।
अँधेरा बढ़ता ही जाता है और मैं ख़ाली हाथ
ख़ाली रस्तों पे नई तान लिए आता हूँ ।
शुक्र है शाम को तंगहाली में भी
ख़ुद को इंसान लिए आता हूँ।
उफ़क़ के पार सवेरा है या नया दिन है,
तुम्हारा साथ रहे गर तो ये भी मुमकिन है।
किसी ने मोड़ का दीपक बुझा दिया है क्या?
मैं ने घर जाने का रस्ता भुला दिया है क्या?
जाम था
में जुनूँ में चलता हूँ
फिर वही बात हुई जाती है
सोचते सोचते ही रात हुई जाती है।
— Sarul















