जो शख़्स जी रहा हो उसूलों की ज़िंदगी
    डरता नहीं वो शख़्स ज़माने को देखकर

    salman khan "samar"
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    तारीख़ मुझे याद रखे या न रखे पर
    तारीख़ बदलने की हिमाकत मैं करूँगा

    salman khan "samar"
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    मजबूत हैं उसूल बुज़ुर्गों के आज भी
    देखो तो आज़मा के उन्हें एक बार तुम

    salman khan "samar"
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    होती हैं किस तरह की परेशानियाँ उन्हें
    शायद कभी बुज़ुर्ग बनो तो समझ सको

    salman khan "samar"
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    निशानियाँ बचा के रख लो तुम बुजुर्गों की
    बुरे समय में ये तुमको बचा के रक्खेंगी

    salman khan "samar"
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    जलते चिरागों को बुझाना तो पड़ेगा
    सुब्ह में सूरज को बुलाना तो पड़ेगा

    salman khan "samar"
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    बाँध कर रख ले ज़रा बालों को तू अपने सनम
    खुल गए जो बाल तेरे तो गिरे है बिजलियाँ

    salman khan "samar"
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    हो गया है हल्का हल्का, तिरी गोद में मिरा सर
    मुझे लग रहा है जैसे, कोई मिल गई दवा अब

    salman khan "samar"
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    याद ग़ालिब ने किया है हम को अपने शहर में तो
    लाज़मी है हम सभी पर इल्म कुछ हासिल करेंगे

    salman khan "samar"
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    सामने मेरे वो बैठा था मगर खामोश था
    और मैं उसके बोल सुनने को बड़ा बेताब था

    salman khan "samar"
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