निशानियाँ बचा के रख लो तुम बुजुर्गों की
बुरे समय में ये तुमको बचा के रक्खेंगी
बाँध कर रख ले ज़रा बालों को तू अपने सनम
खुल गए जो बाल तेरे तो गिरे है बिजलियाँ
हो गया है हल्का हल्का, तिरी गोद में मिरा सर
मुझे लग रहा है जैसे, कोई मिल गई दवा अब
याद ग़ालिब ने किया है हम को अपने शहर में तो
लाज़मी है हम सभी पर इल्म कुछ हासिल करेंगे
सामने मेरे वो बैठा था मगर खामोश था
और मैं उसके बोल सुनने को बड़ा बेताब था