salman khan "samar"

salman khan "samar"

@salmank078613

salman khan "samar" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in salman khan "samar"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वो फिर मिलेंगे राह में बे-वक़्त बे-वजह हम को है इत्तिफ़ाक़ से उम्मीद आज भी — salman khan "samar"
लोग तो रुख़सत कर जाते हैं दुनिया से उन की बस यादें जिन्दा रह जाती हैं — salman khan "samar"
मैं ने ख़राब कर ली तिरे वास्ते ये उम्र बस उँगलियों पे गिन सकूँ इतनी है ज़िंदगी — salman khan "samar"
हम एक दूसरे के लिए ही बने थे पर इक तीसरे ने हम को जुदा कर दिया है दोस्त — salman khan "samar"
सब के चेहरे धुँदले धुँदले लगते हैं मानो ये हँसती आँखें रो बैठी हैं — salman khan "samar"
यूँँ टुकड़ों में दहलीज़ बना लेने से घर की दीवारें रौनक़ खो बैठी है — salman khan "samar"
बच्चों के हाथों में आ कर काग़ज़ कश्ती बन जाते हैं — salman khan "samar"
बच्चों को बचपन के लम्हे जी लेने दो तौर तरीका आते आते आ जाएगा — salman khan "samar"
आप ही आप हो अब नज़र में मिरी आप के दर से ख़ाली न मैं जाऊँगा — salman khan "samar"
तस्वीरें धुँधली हो जाने से यादें थोड़ी धुँधली होती हैं — salman khan "samar"
हम ढूँढ़ते रहे किसी चेहरे में ख़ुद को पर चेहरे तमाम छुप गए चेहरों के दरमियाँ — salman khan "samar"
सावन के बरसते ही जहाँ फूल खिलेंगे क्यूँँ तोड़ लूँ पतझड़ में दरख़्तों की वो शाखें — salman khan "samar"
इस भाग दौड़ में मिरी बीती है ज़िंदगी मैं ढूँढ़ता ही रह गया दो पल सुकून के — salman khan "samar"
इक दूसरे के साथ हैं फिर क्यूँँ हैं इतने दूर हम साथ हैं तो साथ में लगने भी चाहिए — salman khan "samar"
मन का मिलना मिलना है अपना मिलना क्या मिलना — salman khan "samar"
जाने कितने गहरे होते हैं वो अल्फाज़ जो अक्सर ख़ामोशी में सुनाई देते हैं — salman khan "samar"
उफ़ आदतन ही छोड़ के जाता हुआ ये दिन कुछ उम्र मेरी और घटा कर चला गया — salman khan "samar"
खिड़की दरवाज़े सब बंद रखा कीजे घर की बातें घर में अच्छी लगती हैं — salman khan "samar"
नवंबर में ही क्यूँँ मेरा मुक़द्दर रूठ जाता है जनम-दिन आते ही मेरी जो खो बैठी सभी ख़ुशियाँ — salman khan "samar"

Ghazal

तकरार में अजीब सी होती है जुस्तजू रहते हैं दूर जिस से वो उतना है रू-ब-रू लहजे में सादगी है नज़ाकत है मेरे जो हर वक़्त एहतिराम से करता हूँ गुफ़्तगू शर्तें लगा लगा के मोहब्बत को हार जा फिर जीतने की तुझ को रहेगी न आरज़ू छोटी सी बात पे कभी ज़ाया' करो न अश्क रक्खो ज़रा सी आँख में अश्कों की आबरू ऐसे ढले है इश्क़ के पैकर में हम यहाँ आँखों से एक दूजे के लगते हैं हू-ब-हू चलता है उँगलियों के इशारे पे अब मिरे बेहतर था वक़्त रहते किया वक़्त से रुजू कैसे गँवा दूँ जान मैं इक शख़्स के लिए ऐसी हसीं हयात तो मिलती है कू-ब-कू हर वक़्त माँगता हूँ यही रब से मैं दुआ तेरी नज़र में मैं रहूँ मेरी नज़र में तू करनी हो गुफ़्तगू तो मुलाक़ात कर 'समर' कुछ इश्क़ दूर दूर से होते नहीं शुरू — salman khan "samar"
फ़र्ज़ कामों की तरह तुझ को अता करता हूँ मैं नमाज़ों में तिरा नाम जपा करता हूँ मैं उसूलों की इमारत से बना हूँ आख़िर शौक़ दुनिया से ज़रा हट के रखा करता हूँ क़ीमती चीज़ ज़मीं पर गिरे अच्छा तो नहीं उस के अश्कों को हथेली में लिया करता हूँ जिस को ताबीज़ बना कर के ज़माना पहने उस की तस्वीर निगाहों में रखा करता हूँ ऐ ख़ुदा डाल दे झोली में मिरे उस को तू जिस के ख़ातिर मैं तहज्जुद भी पढ़ा करता हूँ मुझ को दुनिया की किसी शय से मोहब्बत ही नहीं तेरी हसरत के लिए रब से लड़ा करता हूँ मैं फ़क़त तुझ सेे मुलाक़ात के ख़ातिर ही तो दाहिनी ओर सड़क के भी चला करता हूँ बाल कटवा के 'समर' यूँँ तो क़यामत हूँ मैं लंबे बालों में मगर ख़ूब जँचा करता हूँ — salman khan "samar"
पलकें झुका के कोई इशारा तो कीजिए इक बार मेरे सामने आँखों को खोलिए समझा बुझा के मुझ को यूँँ वापिस न भेजिए आया हूँ उन के दर पे सो मिलने तो दीजिए बरसों के बा'द आप से ग़ुस्सा हुए हैं हम कुछ और दिन हमें अभी नाराज़ छोड़िए उलझे हुए ही ठीक है गेसू घने घने सुलझा के इन की रौनकें कमतर न कीजिए बस बोलिए जो मन में है सुनते रहेंगे हम ख़ामोश रह के हम से तअल्लुक़ न तोड़िए आवारगी ने मुझ को नई ज़िंदगी है दी आवारगी को छोड़ दूँ ऐसे न बोलिए टूटा हुआ पड़ा हूँ किसी काँच की तरह मुझ को समेटने के लिए सब्र चाहिए दाईं तरफ़ खड़ा हूँ मगर दो क़दम हूँ दूर ज़हमत उठा के थोड़ा निगाहों को मोड़िए सीधा शरीफ़ आदमी बर्बाद है यहाँ टेढ़ा 'समर' ज़रा सा मुझे होने दीजिए — salman khan "samar"
इन्तिज़ार अपना सर-ए-राह जता जाती है आठ बजते ही वो दरवाज़े पे आ जाती है क्यूँँ मिरे इश्क़ का इतना वो अदब करती है जो मिरे सामने नज़रों को झुका जाती है जब भी बहनों से कलाई पे बँधा लूँ राखी ख़ुश्क हाथों में नमी लौट के आ जाती है उस को मालूम नहीं इश्क़ की ता'लीम है क्या वो तो बस इश्क़ को इक ज़ुर्म बता जाती है वो अगर सामने आई तो मिरा क्या होगा जिस की तस्वीर मुझे इतना सता जाती है चाहते जब भी हुई उस सेे मिलाने को नज़र वो मिरे सामने नज़रों को झुका जाती है क्यूँँ तअल्लुक़ न रखूँ उस की निगाहों से 'समर' जो इशारों में कई राज़ बता जाती है — salman khan "samar"
हर लफ़्ज़ में क़ुदरत है शाइ'र के घराने में अश'आर की चाहत है शाइ'र के घराने में लफ़्ज़ों की हुकूमत है शाइ'र के घराने में हर शे'र सलामत है शाइ'र के घराने में मिट्टी से बना हूँ मैं मिट्टी में ही जाना है मिट्टी भी मोहब्बत है शाइ'र के घराने में अश्कों को सजाएँगे लफ़्ज़ों में बताएँगे हर चीज़ की इज़्ज़त है शाइ'र के घराने में जो हुस्न ज़माने के कुछ काम न आता है वो हुस्न क़यामत है शाइ'र के घराने में नफ़रत के ज़माने को ये पाठ पढ़ाया है नफ़रत भी मोहब्बत है शाइ'र के घराने में हर ख़्वाब फ़साना है दुनिया की निगाहों में हर ख़्वाब हक़ीक़त है शाइ'र के घराने में 'सलमान' को नाकारा कहता है ज़माना पर 'सलमान' भी रहमत है शाइ'र के घराने में — salman khan "samar"

Nazm

“बचपन का ज़माना “ बचपन के ज़माने को मैं भूल न पाऊँगा बचपन का दिवाना हूँ हर बार बताऊँगा मैं माँ का दुलारा था पापा का सितारा था हर ख़्वाब मुकम्मल था बचपन के ज़माने में कूदा हूँ मैं पेड़ों से पत्तों से बनाई नाव तैरा हूँ मैं दरिया में बचपन के ज़माने में गाँव की हो पगडंडी या शहर की वो सड़कें सब रस्तों को मापा है बचपन के ज़माने में ना धूप ने रोका था ना धूल ने रोका था घूमा हूँ मैं पूरे दिन बचपन के ज़माने में माटी के खिलोनों से खेला था कभी मैं तो माटी थी बड़ी प्यारी बचपन के ज़माने में हिन्दू न कोई मुस्लिम सब एक थे बचपन में ज्ञानी थे बड़ो से हम बचपन के ज़माने में लिखना भी न आता था पढ़ना भी न आता था बस खेल ही खेला था बचपन के ज़माने में चप्पल को बिना पहने दौड़ा हूँ ज़माने में मापा है मुहल्ले को बचपन के ज़माने में बचपन के ज़माने को मैं भूल न पाऊँगा बचपन का दिवाना हूँ हर बार बताऊँगा दुनिया से निराला था बचपन जो हमारा था हर चीज़ से प्यारा था बचपन जो हमारा था ख़्वाहिश भी मुकम्मल थी हर ख़्वाब हमारा था कितना वो निराला था बचपन जो हमारा था मासूम वो आँखें थी बातों में रवानी थी क्यूँँ याद बहुत आया बचपन जो हमारा था पैसे जो चुराते थे फिर माँ से छिपाते थे पापा ने सुधारा था बचपन जो हमारा था बचपन के ज़माने को मैं भूल न पाऊँगा बचपन का दिवाना हूँ हर बार बताऊँगा मिट्टी से बनाए घर दरिया के किनारे पर ये बात हमारी है बचपन के ज़माने की आँखों में भरी उमँगे चेहरे पे सजाया नूर ये याद निराली है बचपन के ज़माने की दरिया के किनारे पर घूमा था सबेरे तक तब याद मुझे आई बचपन के ज़माने की दुश्मन से मोहब्बत थी हर शख़्स हमारा था ये बात पुरानी है बचपन के ज़माने की बचपन के ज़माने को मैं भूल न पाऊँगा बचपन का दिवाना हूँ हर बार बताऊँगा — salman khan "samar"