ज़रा सी चाह ज़रा सी किसी ख़ुशी के लिए
हज़ारों बार मरे लोग ज़िन्दगी के लिए
हज़ारों बार मरे लोग ज़िन्दगी के लिए
करेंगे क़त्ल वो हर रोज़ सनसनी के लिए
ज़मीर बेच के आए हैं पैरवी के लिए
पिसे हैं खूब रिवाज़ों की हम तो चक्की में
मरीज़-ए-इश्क़ रहे बस तो बेख़ुदी के लिए
कमी ज़रूर ही लहजे में कुछ रही आख़िर
तरस रहे हैं जो तहज़ीब लखनवी के लिए
शुमार कैसे नहीं होते आशिक़ों में हम
जलाया क़ल्ब-ओ- जिगर खूब आशिक़ी के लिए
जले चराग़ थे रौनक़ के वास्ते लेकिन
जले हैं देख पतंगे भी दिलकशी के लिए
किसी की मौत पे होती है क्यूँ ख़ुशी उस को
बना है आदमी क्या सिर्फ़ बे-हिसी के लिए
नहीं पसंद उसे जब तेरी ग़ज़ल 'मीना'
तो उजलते ही तुझे क्यूँ है शा'इरी के लिए
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दुनिया को इस तरह से सलामत रखा गया
दो दिल मिले तो नाम मुहब्बत रखा गया
दो दिल मिले तो नाम मुहब्बत रखा गया
गर वक़्त साथ दे तो बुलंदी पे हैं सभी
रूठा अगर तो नाम कयामत रखा गया
फैलाया हाथ हम ने किसी के न सामने
ख़ुद्दारियों को सारी अलामत रखा गया
सब कुछ लुटाया उस ने हमारे ही वास्ते
माँ का भी नाम इस लिए जन्नत रखा गया
पहचान हम को ग़ज़लों से यारा मिली कहाँ
शाइ'र नहीं ये तर्के -हक़ीक़त रखा गया
लिख दी ग़ज़ल है आज ये मीना ने ख़ून से
उनवान ख़ूब इस का भी उल्फ़त रखा गया
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कतरे से हो गए हैं समुंदर तवील से
ख़ुद पे रहा न हम को भरोसा तुम्हारे बा'द
कैसे सुनाएँ बज़्म में क़िस्सा-ए-इश्क़ हम
शाइ'र बना है दिल ये हमारा तुम्हारे बा'द
मँझधार में खड़े हैं मनाज़िर अजीब हैं
कैसे मिले बताओ किनारा तुम्हारे बा'द
ख़्वाबों की किर्चियाँ हैं मेरी चश्मे-नम में कुछ
तौबा है महवे-यास तमन्ना तुम्हारे बा'द
हर सम्त तीरगी है अकेला है एक शख़्स
सूना सा लग रहा ये दरीचा तुम्हारे बा'द
तश्ते-मुराद भी तो है मीना तही मेरा
हर्गिज़ न बन सका कोई मेरा तुम्हारे बा'द
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ग़ुंचे अजीब तर थे गुल -ए- तर अजीब था
आँखें खुलीं तो शहर का मंज़र अजीब था
आँखें खुलीं तो शहर का मंज़र अजीब था
ख़ुशियाँ तमाम उम्र मुयस्सर न हो सकीं
उस नेक आदमी का मुक़द्दर अजीब था
निकला था दुश्मनों को मिटाने के वास्ते
अपनो को मार आया वो लश्कर अजीब था
दुनिया को जीतने की तो चाहत रही उसे
ख़ुद को न जीत पाया सिकन्दर अजीब था
उस हुस्न -ए -बे -मिसाल के जलवों के सामने
रौशन फ़लक पे माह -ए -मुनव्वर अजीब था
उस की हवस ने शहर को वीरान कर दिया
मैं ने सुना है भीड़ का तेवर अजीब था
ताजिर जहाँ ग़मों का ही मीना था हर कोई
ख़ुशियों को बाँटता वो सुख़न-वर अजीब था
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हम सफ़र मौत बने पास वो मेरे आए
मैं भी काँधों पे कभी बन के जनाज़ा निकलूँ
ख़्वाहिशें मेरी तो अब पूरी कहाँ होती हैं
हुस्न की बज़्म से हरदम ही मैं तन्हा निकलूँ
ज़ुल्म होते बडे़ देखो यहाँ इंसानों पर
मैं भी लोगों को कभी दे के दिलासा निकलूँ
मार डालेगी हमें यूँ तो ये उल्फ़त बेशक
प्यार का दिल में मगर ले के ख़ज़ाना निकलूँ
राज़ सीने में दबा कर मैं तड़पती हूँ क्यूँ
अब हक़ीक़त का मैं कर के ही खुलासा निकलूँ
लफ़्ज़ सीने में लिए बज़्म से अक़्सर आई
क्यूँ न महफ़िल में ग़ज़ल कह के मैं मीना निकलूँ
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इस इश्क़ की राहों से तो अनजान हैं हम भी
कमसिन हैं अगर आप तो नादान हैं हम भी
कमसिन हैं अगर आप तो नादान हैं हम भी
जब आएँ सुनाने वो हमें ग़म का फ़साना
ये कैसे कहें हम कि परेशान हैं हम भी
ज़रदार अगर तुम हो मियाँ लाल-ओ-गुहरस
दौलत है बहुत इल्म की धनवान हैं हम भी
ताक़त का हमें डर न दिखाएँ कभी हज़रत
आँधी हैं अगर आप तो तूफ़ान हैं हम भी
तूफ़ान बड़े आए मिटाने को हमें पर
तिलभर न हिला पाए कि चट्टान हैं हम भी
इक रोज़ गुज़र जाएँगे ख़ामोश यहाँ से
कुछ दिन के फ़क़त देखिए मेहमान हैं हम भी
क्या खूब ग़ज़ल आज ये तुम ने कही यारा
पर याद रखो मीर का दीवान हैं हम भी
बेचा न मुसीबत में भी ईमान को 'मीना'
है नाज़ बहुत साहिब-ए-ईमान हैं हम भी
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आप को अब छोड़ कर कुछ सोचना मुमकिन नहीं
आप जैसा कोई होगा माहिया मुमकिन नहीं
जब से देखा है इसे चेहरे की रंगत है उड़ी
सच बयाँ करता न हो ये आइना मुमकिन नहीं
हम ने माना है वफ़ा उस शख़्स के किरदार में
पर सभी से देखिए करना वफ़ा मुमकिन नहीं
जिस की फ़ितरत है गिनाना दूसरों के ही गुनाह
हर क़दम पर वो भी होगा पारसा मुमकिन नहीं
पाँवों में बाँधे रहे घुँघरू रिवाजों के मगर
बस इशारों पर ही नाचें ये हुआ मुमकिन नहीं
कुछ न कुछ कमज़ोरियाँ तो आदमी की है सिफ़त
आदमी हो जाए कोई देवता मुमकिन नहीं
ख़ाक ही हासिल हुई 'मीना' हमेशा प्यार में
हुस्न से अब दिल हो मेरा आश्ना मुमकिन नहीं
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ख़ाली दफ़्तर और नहीं कुछ
गायब अफ़सर और नहीं कुछ
गायब अफ़सर और नहीं कुछ
दिल रखने को ही तुम कह दो
तुम से सुंदर और नहीं कुछ
लिपटे रहते हैं चंदन से
हरदम विषधर और नहीं कुछ
रिश्वत की बस ख़्वाहिश इनको
खाते अफ़सर और नहीं कुछ
दर्द-ए-जिगर की ख़ाक दवा लूँ
मय से बेहतर और नहीं कुछ।
सिर्फ़ किताबें सिर्फ़ रिसाले
बस मेरे घर और नहीं कुछ
तंज़ कसें बस तेरी ग़ज़लें
करती दिन भर और नहीं कुछ
मेरी तमन्ना तेरी चाहत
चाहूँ दिलबर और नहीं कुछ
जो बोले सच बोले 'मीना'
सच से हटकर और नहीं कुछ
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हम को समझते हैं वो गुनहगार की तरह
पढ़कर ही फेंक देते हैं अख़बार की तरह
पढ़कर ही फेंक देते हैं अख़बार की तरह
तूफ़ान ऐसा आया किनारे भी डर गए
हम देखते रहे यूँ ही लाचार की तरह
उन की नवाज़िशें थीं, करम भी ख़ुदा का था
शामिल हुए वो ज़ीस्त में दिलदार की तरह
झूठे थे उन के वादे जो पूरे नहीं हुए
लेकिन वो हुक्म देते हैं सरकार की तरह
नागिन बनी हैं ज़ुल्फ़ें भी डसती हैं रात-दिन
नैनों के तीर चलते हैं तलवार की तरह
क़ाइल भी सादगी के, अदास हमें लगाव
हर गाम पर मिलेंगे वफ़ादार की तरह
अब हुस्न-ए-यार में वो कशिश ही नहीं रही
हालात ने बना दिया बीमार की तरह
'मीना' तो है रद़ीफ मगर क़ाफ़िया हैं आप
अपना वज़ूद गोया है अश'आर की तरह
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आप की नज़रों का गर कोई इशारा होता
चाँद को हम ने ज़मीं पर ही उतारा होता
चाँद को हम ने ज़मीं पर ही उतारा होता
दूर परदेस में अपना न दुलारा होता
मुफ़लिसी का न अगर घर में इज़ारा होता
पार कर लेते मुहब्बत का हर इक दरिया भी
पास अपने भी अगर कोई शिकारा होता।
प्यार गर तुम भी किसी से मेरे हमदम करते
हाल जो आज हमारा है तुम्हारा होता
एक दिन डोली में रुख़्सत भी उसे करते तुम
तुम ने गर कोख में बेटी को न मारा होता
बढ़ के शायद मैं उसे रोक भी लेता फिर से
हाथ में जो तेरे पल्लू का किनारा होता
दाद 'मीना' की ग़ज़ल को भी तो होती हासिल
ख़ून से दिल के अगर इस को निख़ारा होता
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