जिसने ज़ख़्मों को ही उभारा हो
साथ उस के कहाँ गुज़ारा हो
चाँद कितना हसीन लगता है
साथ में जब कोई सितारा हो
इक इशारे पे जान भी दे दूँ
काश तेरा अगर इशारा हो
मुझ को डसने लगी है तन्हाई
साथ कुछ रोज़ अब तुम्हारा हो
होश खो बैठे ये ज़फर अपना
इस क़दर हुस्न का नज़ारा हो
कुछ नहीं तेरी सुनने वाले अब
तू लगा ले ज़बाँ पे ताले अब
सब के सब कब तलक यूँ बैठोगे
पाँव घर से कोई निकाले अब
जितना चाहे तराश डाले तू
ख़ुद को तेरे किया हवाले अब
ज़ुल्म तुम को नज़र नहीं आता
साफ़ आँखों के कर लो जाले अब
ज़ाइक़ा ही बिगड़ गया मुँह का
ऐसे महँगे हुए निवाले अब
मौत अब जान ले के छोड़ेगी
है कोई जो तुझे बचा ले अब
बुज़दिली अब नहीं दिखाऍंगे
हो गए हैं ज़फर जियाले अब
प्यास बुझती नहीं होंठ सूखे पड़े
हाल क्या हो गया ग़म के बाज़ार में
रात कटती है बिस्तर पे करवट में अब
चैन लूटा है तू ने सनम प्यार में
उम्र भर की मेरी कमाई हो
पास आ हिज्र रिहाई हो
तू कोई तो दवा बता ऐसी
ज़ख़्म की जो मिरे दवाई हो
ज़िन्दगी भर ही ज़ख़्म झेले हैं
ज़ख़्म से काश अब जुदाई हो
शोहरतें क्यों नहीं मिलेंगी मुझे
हर तरफ़ मेरी भी बुराई हो
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
काश इस बह्र में रुबाई हो
एक पल भी बता मुझे ऐसा
जब 'ज़फ़र' ने ख़ुशी मनाई हो
मैने बचा रखा है ईमान ज़िन्दगी में
दूँ साथ हक का है ये अरमान ज़िन्दगी में
मै चल पड़ा मिटाने नफ़रत जहाँ से सारे
ये राह भी नहीं है आसान ज़िन्दगी में