Zafar Siddqui

Zafar Siddqui

@zafarsiddiqui21

Zafar Siddqui shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Zafar Siddqui's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
सब हमीं पर ही लाज़मी है क्या
तुम भी वादा कभी करो कोई
Zafar Siddqui
ज़ुल्म की इंतिहा बुरी होगी
सोच कर बस ये मर गया कोई
Zafar Siddqui
बात अब तीर की तरह होगी
शायरी मीर की तरह होगी

है फ़साना ज़फ़र का राँझा सा
दास्ताँ हीर की तरह होगी
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Zafar Siddqui
ये तुम्हें क्या हुआ है क्या ग़म है
तुम बताओ तो आँख क्यों नम है

एक ही घूँट में शिफ़ा होगी
पीके देखो ये आब-ए-ज़मज़म है
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Zafar Siddqui
जंग मैदान-ए-जंग में होगी
क़त्ल भी अब किसी को होना है
Zafar Siddqui
तुम यक़ीं मत मशीन पर रखना
पाँव अपने ज़मीन पर रखना

वो ज़फ़र जाल में फँसाएगा
तुम नज़र उस हसीन पर रखना
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Zafar Siddqui
जो अदब की है पहचान पढ़ता हूँ मैं
मीर-ओ-ग़ालिब का दीवान पढ़ता हूँ मैं


मत पढ़ाओ मुझे पाठ नफ़रत का तुम

अम्न जिस में है क़ुरआन पढ़ता हूँ मैं
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Zafar Siddqui
मुहब्बत ये मुहब्बत वो मुहब्बत
सिवाए दर्द-ओ-ग़म के कुछ नहीं है
Zafar Siddqui
वो बड़े ही सख़्त तेवर में दिखा है
इश्क़ के भी आज फ़ेवर में दिखा है

हो गई काफ़ूर चेहरे की कशिश भी
हिज्र का ग़म उसके ज़ेवर में दिखा है
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Zafar Siddqui
हाथ में उसके अँगूठी नाक में थी उस के नथ
रात मुझ को देख कर वो ख़ूब शरमाती रही
Zafar Siddqui
यार की यार से जुदाई है
हिज्र की याद से लड़ाई है

ग़म से मेरा उदास है बिस्तर
याद तेरी 'ज़फर' जो आई है
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Zafar Siddqui
ख़्वाब ये जाने क्यों मुझ को शब आ गए
प्यासे लब पर मिरे तेरे लब आ गए

मैं तो मदहोश बाँहों में तेरी हुआ
दिन मिरे यानी अच्छे ही अब आ गए
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Zafar Siddqui
मुझ को बख़्शी है तू ने ख़ुद्दारी
मुफ़्लिसी दिल से शुक्रिया तेरा
Zafar Siddqui
मिल रहा है गले ज़फ़र दुश्मन
ईद ऐसी बहार लाई है
Zafar Siddqui
कॉल पर कॉल हमदम करे है
राह दुश्वार मौसम करे है

बीच मझधार में फँस गया हूँ
आँख ये मसअला नम करे है
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Zafar Siddqui
हुई है आँख क्यों पुर-नम समझ ले
ज़फ़र के प्यार को हमदम समझ ले

सही जाती नहीं फ़ुर्क़त तिरी अब
मिरे ग़म को तू अपना ग़म समझ ले
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Zafar Siddqui
प्यास बुझती नहीं होंठ सूखे पड़े
हाल क्या हो गया ग़म के बाज़ार में

रात कटती है बिस्तर पे करवट में अब
चैन लूटा है तू ने सनम प्यार में
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Zafar Siddqui
यूँ सितम उसने माँ पे ढाया है
माँ के ज़ेवर ही बेच आया है

चापलूसी है करता बीवी की
और माँ को फ़क़त सताया है
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Zafar Siddqui
आँख से अपनी पिला दे
इश्क़ का कुछ तो नफ़ा' दे

होंठ हैं बीमार कब से
चूम कर इन को दवा दे
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Zafar Siddqui
इश्क़ का यूँ जवाब लेना है
यानी उस से गुलाब लेना है

उसने तोहफ़े गिना दिए हैं ज़फर
अब तुझे भी हिसाब लेना है
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Zafar Siddqui

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