हुई है आँख क्यूँ पुर-नम समझ लेज़फ़र के प्यार को हमदम समझ लेसही जाती नहीं फ़ुर्क़त तिरी अबमिरे ग़म को तू अपना ग़म समझ ले— Zafar Siddqui