ग़ुंचे अजीब तर थे गुल -ए- तर अजीब था
आँखें खुलीं तो शहर का मंज़र अजीब था
ख़ुशियाँ तमाम उम्र मुयस्सर न हो सकीं
उस नेक आदमी का मुक़द्दर अजीब था
निकला था दुश्मनों को मिटाने के वास्ते
अपनो को मार आया वो लश्कर अजीब था
दुनिया को जीतने की तो चाहत रही उसे
ख़ुद को न जीत पाया सिकन्दर अजीब था
उस हुस्न -ए -बे -मिसाल के जलवों के सामने
रौशन फ़लक पे माह -ए -मुनव्वर अजीब था
उस की हवस ने शहर को वीरान कर दिया
मैं ने सुना है भीड़ का तेवर अजीब था
ताजिर जहाँ ग़मों का ही मीना था हर कोई
ख़ुशियों को बाँटता वो सुख़न-वर अजीब था
— Meena Bhatt















