ज़रा सी चाह ज़रा सी किसी ख़ुशी के लिए
हज़ारों बार मरे लोग ज़िन्दगी के लिए
करेंगे क़त्ल वो हर रोज़ सनसनी के लिए
ज़मीर बेच के आए हैं पैरवी के लिए
पिसे हैं खूब रिवाज़ों की हम तो चक्की में
मरीज़-ए-इश्क़ रहे बस तो बेख़ुदी के लिए
कमी ज़रूर ही लहजे में कुछ रही आख़िर
तरस रहे हैं जो तहज़ीब लखनवी के लिए
शुमार कैसे नहीं होते आशिक़ों में हम
जलाया क़ल्ब-ओ- जिगर खूब आशिक़ी के लिए
जले चराग़ थे रौनक़ के वास्ते लेकिन
जले हैं देख पतंगे भी दिलकशी के लिए
किसी की मौत पे होती है क्यूँ ख़ुशी उस को
बना है आदमी क्या सिर्फ़ बे-हिसी के लिए
नहीं पसंद उसे जब तेरी ग़ज़ल 'मीना'
तो उजलते ही तुझे क्यूँ है शा'इरी के लिए















