दिल तुम्हें आज भी बुलाता है
और फिर थक के बैठ जाता है
मैं नहीं चाहता की याद आऊँ
याद जैसा मुझे वो आता है
कोई वा'दा किसी से हो ही क्यूँ
कौन वादों को अब निभाता है
बात होती है भूलने की मगर
कब किसे कोई भूल पाता है
अपने ख़्वाबों को बेचकर कोई
चार पैसे कहीं कमाता है
बात दिल की तू दिल में रहने दे
क्यूँ तमाशा इसे बनाता है
— Avinash bharti















