देती रहती है हवा पैग़ाम क्या
सुब्ह क्या कहती है कहती शाम क्या
हँसता हूँ तो आँखें ग़ुस्सा करती हैं
आँसू के घर है हँसी का काम क्या
कोई चेहरा आता तो है ज़ेहन में
याद बस आता नहीं है नाम क्या
इश्क़ की जब चाकरी मंज़ूर की
नींद क्या होती है और आराम क्या
दिल हमारा मुफ़्त ले जाए कोई
टूटी चीज़ों के लगाएँ दाम क्या
— Avinash bharti















