तुम्हारी सोच में मिलते नहीं हम
    हमारी बात ही कुछ और है अब
    Vishakt ki Kalam se
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    मुझे कुछ भी नहीं समझा उन्होंने
    जिन्हें मैं ख़ास अपना मानता था

    मुझे धोखा दिया आँखों ने मेरी
    नहीं ये लोग जिसको जानता था
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    तुझे मिलकर लगा था रब मिलेगा
    नहीं जो अब मिला फ़िर कब मिलेगा
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    तिमिर की हर कहानी में उजाले का ही ताला है
    सफ़ेदी दूर होते ही चमकता सार काला है
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    बहाने ढूंढ़ लेते हैं हमें पागल बताने के
    नहीं वो छोड़ते मौका कभी हमको सताने के
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    मिटा दे तू सभी यादें मिटा दे वो सभी पल
    मिटा दे तू अभी सब कुछ मिटा दे वो मिरा कल
    Vishakt ki Kalam se
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    सभी कुछ शांत है बाहर हमारे
    मगर अंदर तबाही हो रही है

    हैं बातें तो बहुत सी करनी हमको
    मगर उनसे मनाही हो रही है
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    हवा में फैलता उत्साह ये अब
    नशा है राम के ही नाम का सब
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    अँधेरों में मिले हम से
    उजाले में छिपे थे जो
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    न थी वो साथ तब मेरे
    न है वो साथ अब मेरे

    उसी के शौक़ थे सब ये
    हुए जो शौक़ अब मेरे
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