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आग तू ने क्या लगाई दिल में तो जान ए जिगर
फिर हुआ क्या शहर मेरा दिल जलों का हो गया
फिर हुआ क्या शहर मेरा दिल जलों का हो गया
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शाम कितनी थी शबीना यार तेरे साथ में
क्या हुआ जो था मेरा ही हाथ तेरे हाथ में
क्या हुआ जो था मेरा ही हाथ तेरे हाथ में
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"सफ़र"
हर रोज़ नींद की आग़ोश से निकल कर
मैं तन्हा जाता हूँ घर से निकल कर
फिर यूँ कि कुछ इंतिज़ार होता है
उन रास्तों से मुश्किल से प्यार होता है
हर लम्हे बस वही याद आती है
वो शहर में बिताई हुई शाम याद आती है
हम थे कभी भीड़ का एक हिस्सा
अब महज़ बन कर रह गया है एक क़िस्सा
बहुत मुश्किल था अपने शहर से हिजरत करना
मगर ये काम भी ज़रूरी था मुझ को करना
रास्ते में बहुत कुछ नया–नया सा दिखता है
मगर अब तुझ सेा कहाँ कुछ दिखता है
अब तो मुसलसल जारी रहता है सफ़र
मगर अफ़सोस तू इस मुसाफ़िर के हाल से है बे-ख़बर
Read Fullमैं तन्हा जाता हूँ घर से निकल कर
फिर यूँ कि कुछ इंतिज़ार होता है
उन रास्तों से मुश्किल से प्यार होता है
हर लम्हे बस वही याद आती है
वो शहर में बिताई हुई शाम याद आती है
हम थे कभी भीड़ का एक हिस्सा
अब महज़ बन कर रह गया है एक क़िस्सा
बहुत मुश्किल था अपने शहर से हिजरत करना
मगर ये काम भी ज़रूरी था मुझ को करना
रास्ते में बहुत कुछ नया–नया सा दिखता है
मगर अब तुझ सेा कहाँ कुछ दिखता है
अब तो मुसलसल जारी रहता है सफ़र
मगर अफ़सोस तू इस मुसाफ़िर के हाल से है बे-ख़बर
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सफ़र
हर रोज़ नींद की आग़ोश से निकल कर
मैं तन्हा जाता हूँ घर से निकल कर
फिर यूँ के कुछ इंतिज़ार होता है
उन रास्तों से मुश्किल से प्यार होता है
हर लम्हे बस वही याद आती है
वो शहर में बिताई हुई शाम याद आती है
हम थे कभी भीड़ का एक हिस्सा
अब महज़ बन कर रह गया है एक क़िस्सा
बहुत मुश्किल था अपने शहर से हिजरत करना
मगर ये काम भी ज़रूरी था मुझ को करना
रास्ते में बहुत कुछ नया–नया सा दिखता है
मगर अब तुझ सेा कहाँ कुछ दिखता है
अब तो मुसलसल जारी रहता हैं सफ़र
मगर अफ़सोस तू इस मुसाफ़िर के हाल से है बे-ख़बर
Read Fullमैं तन्हा जाता हूँ घर से निकल कर
फिर यूँ के कुछ इंतिज़ार होता है
उन रास्तों से मुश्किल से प्यार होता है
हर लम्हे बस वही याद आती है
वो शहर में बिताई हुई शाम याद आती है
हम थे कभी भीड़ का एक हिस्सा
अब महज़ बन कर रह गया है एक क़िस्सा
बहुत मुश्किल था अपने शहर से हिजरत करना
मगर ये काम भी ज़रूरी था मुझ को करना
रास्ते में बहुत कुछ नया–नया सा दिखता है
मगर अब तुझ सेा कहाँ कुछ दिखता है
अब तो मुसलसल जारी रहता हैं सफ़र
मगर अफ़सोस तू इस मुसाफ़िर के हाल से है बे-ख़बर
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