ज़ाहिद तेरे ख़याल में किसने ख़लल है दी
बाक़ी रहा ये दिल में कही बस मलाल है
मेरे अपने सभी ज़ख़्म भरने लगे
इश्क़ में किस क़दर हम उभरने लगे
याद तेरी जुनूँ में जब आती रही
ख़ाक बन कर फ़ज़ा में बिखरने लगे
मैंने देखा मुहब्बत में मजनूँ भी फिर
ख़्वाब की बंदगी में निखरने लगे
जब से माँ ने कभी हाथ अपना रखा
हादसे पास आकर ठहरने लगे
मैं ही था पागल कहीं ख़ुद मेरे ही इमकान से
तोड़ जाता दिल मेरा ही कितने इत्मीनान से
आग तूने क्या लगाई दिल में तो जान ए जिगर
फिर हुआ क्या शहर मेरा दिल जलों का हो गया
रास्ते को सभी कर के ज़ीशान तू
नूर का ही कही फिर था पैमान तू
मेरा अपना गिरेबान तो चाक है
दिल की बस्ती का खाली सा मीज़ान तू
मेरे हालात से मुत्मइन हैं सभी
मेरे किरदार से अब है अंजान तू
मैं तो साहिल से फिर लौटकर भी कहीं
उजड़ी कश्ती का ही फिर है सामान तू
शाम कितनी थी शबीना यार तेरे साथ में
क्या हुआ जो था मेरा ही हाथ तेरे हाथ में
"सफ़र"
हर रोज़ नींद की आग़ोश से निकल कर
मैं तन्हा जाता हूँ घर से निकल कर
फिर यूँ कि कुछ इंतिज़ार होता है
उन रास्तों से मुश्किल से प्यार होता है
हर लम्हे बस वही याद आती है
वो शहर में बिताई हुई शाम याद आती है
हम थे कभी भीड़ का एक हिस्सा
अब महज़ बन कर रह गया है एक क़िस्सा
बहुत मुश्किल था अपने शहर से हिजरत करना
मगर ये काम भी ज़रूरी था मुझको करना
रास्ते में बहुत कुछ नया–नया सा दिखता है
मगर अब तुझसा कहाँ कुछ दिखता है
अब तो मुसलसल जारी रहता है सफ़र
मगर अफ़सोस तू इस मुसाफ़िर के हाल से है बेख़बर
सफ़र
हर रोज़ नींद की आग़ोश से निकल कर
मैं तन्हा जाता हूँ घर से निकल कर
फिर यूँ के कुछ इंतिज़ार होता है
उन रास्तों से मुश्किल से प्यार होता है
हर लम्हे बस वही याद आती है
वो शहर में बिताई हुई शाम याद आती है
हम थे कभी भीड़ का एक हिस्सा
अब महज़ बन कर रह गया है एक क़िस्सा
बहुत मुश्किल था अपने शहर से हिजरत करना
मगर ये काम भी ज़रूरी था मुझको करना
रास्ते में बहुत कुछ नया–नया सा दिखता है
मगर अब तुझसा कहाँ कुछ दिखता है
अब तो मुसलसल जारी रहता हैं सफ़र
मगर अफ़सोस तू इस मुसाफ़िर के हाल से है बेख़बर