रास्ते को सभी कर के ज़ीशान तू
नूर का ही कही फिर था पैमान तू
मेरा अपना गिरेबान तो चाक है
दिल की बस्ती का ख़ाली सा मीज़ान तू
मेरे हालात से मुत्मइन हैं सभी
मेरे किरदार से अब है अंजान तू
मैं तो साहिल से फिर लौट कर भी कहीं
उजड़ी कश्ती का ही फिर है सामान तू
— Kashif Hussain Kashif















