मेरे अपने सभी ज़ख़्म भरने लगे
इश्क़ में किस क़दर हम उभरने लगे
याद तेरी जुनूँ में जब आती रही
ख़ाक बन कर फ़ज़ा में बिखरने लगे
मैं ने देखा मुहब्बत में मजनूँ भी फिर
ख़्वाब की बंदगी में निखरने लगे
जब से माँ ने कभी हाथ अपना रखा
हादसे पास आ कर ठहरने लगे
— Kashif Hussain Kashif















