Hemant Sakunde

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    सोचता हूँ छोड़ दूँ अब शेर कहना
    सोचकर इक शेर कैसे चुप रहूँ मैं

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    बाप की डाँट भूल जाता हूँ
    कहते जब आ गले लगाता हूँ

    कोई दस्तक भले न दे लेकिन
    दीप मैं रोज़ इक जलाता हूँ

    खोजती है नज़र किसे तेरी
    जब भी आवाज़ मैं लगाता हूँ

    चाँद है आसमान में तो क्या
    मैं सितारा हूँ टिमटिमाता हूँ

    इक मुलाकात याद करके मैं
    इक ग़ज़ल रोज़ गुनगुनाता हूँ

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    आरसी के उस तरफ़ कोई ख़फ़ा था
    आज आँखें भी न मुझसे वो मिलाता

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    सब राज करना चाहते जिस क़ल्ब पर
    उस पर सियासत तो हमारी ही रही

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    ख़ामोश साया रोकना चाहे तुझे
    रुककर ज़रा उसकी दशा तो देखले

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    ऐ ख़ुदा अब तो फ़रिश्ते भेज दे
    या लकीरें सब मिटा दे हाथ की

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    वो माँगते हमसे हमारी ज़िंदगी
    हम तब थमा देते हमारी वो कलम

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    उस फूल से ख़ुशबू चुरा लूँ मैं अगर
    दो चार काँटे भी चुभे तो डर नहीं

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    क़ुदरत अचानक क्यों हसीं लगने लगी
    ये इक नई मुस्कान उल्फ़त तो नहीं

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    पल में होते आँसू ओझल
    डरते हैं लोगों से मिलकर

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