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आरसी के उस तरफ़ कोई ख़फ़ा था
आज आँखें भी न मुझ से वो मिलाता
आज आँखें भी न मुझ से वो मिलाता
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सब राज करना चाहते जिस क़ल्ब पर
उस पर सियासत तो हमारी ही रही
उस पर सियासत तो हमारी ही रही
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ऐ ख़ुदा अब तो फ़रिश्ते भेज दे
या लकीरें सब मिटा दे हाथ की
या लकीरें सब मिटा दे हाथ की
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वो माँगते हम से हमारी ज़िंदगी
हम तब थमा देते हमारी वो क़लम
हम तब थमा देते हमारी वो क़लम
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पल में होते आँसू ओझल
डरते हैं लोगों से मिल कर
डरते हैं लोगों से मिल कर
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