बाक़ी नहीं रहा है कोई रब्त शहर से
या'नी कि ख़ुश रहेंगे यहाँ ख़ुश रहे बग़ैर
या'नी कि ख़ुश रहेंगे यहाँ ख़ुश रहे बग़ैर
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चर्ख़ मेरी प्यास से वाक़िफ़ हुआ
धूप ने सहरा पे दरिया लिख दिया
धूप ने सहरा पे दरिया लिख दिया
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फिर वही ज़िक्र है फिर वही सवाल है
बस अभी तौबा है फिर वही ख़याल है
बस अभी तौबा है फिर वही ख़याल है
ढूँढ़ता फिर रहा, कौन है किधर गया
शख़्स आईने में था अभी, कमाल है
एक जैसे हैं, वो और उस की बात भी
आ सके तेरी-मेरी समझ, मजाल है
दो ज़रा बात कर कोई ग़म ठहर ज़रा
ज़िंदगी सी कहाँ ज़िंदगी मुहाल है
एक पल सच लगे एक पल मुग़ालता
कौन सा अर्श है कौन सा ज़वाल है
ज़िंदगी कुछ है, तेरे ख़याल के सिवा
ये तेरा हिज्र है या तेरा विसाल है
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तन्हा रहना और ख़ुश रहना, सज़ा काफ़ी नहीं
तय हुआ वक़तन-फ़वक़तन सामने भी आना है
तय हुआ वक़तन-फ़वक़तन सामने भी आना है
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कुछ बताओ, उदास भी हो क्या
अच्छा, ख़ामोशी महज़ आदत है
सुब्ह से शाम काम है, या'नी
सुब्ह से शाम आज फ़ुर्सत है
बेवज़ह सुब्ह-सुब्ह ख़ुश हूँ मैं
नींद के पास कोई ने'मत है
सारा दिन घर में रहना, क्या है ये
सच कहो, कब से ऐसी हालत है
चुप रहूँ और माजरा कह दूँ
सोच लो, मैं कहूँ, क्या इजाज़त है
सुब्ह के चार बजने को आए
नींद किन ख्वाहिशों को रिश्वत है
बात मेरी समझ नहीं आई
आदमी की ही क्या ज़रूरत है
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बस हाल रूका और दौड़ गया
फिर वक़्त उसी हाल छोड़ गया
फिर वक़्त उसी हाल छोड़ गया
आख़िर सो गया बाग़बाँ मेरा
आख़िर मुझे फिर कोई तोड़ गया
घर लौट जाना था जहाँ से हमें
इस रास्ते का ऐसा मोड़ गया
किस दर्जा बिखर के सुकूँ से था
अब फिर से मुझे कौन जोड़ गया
संजीदगी में रात भर जो हुआ
मैं सुब्ह वही हाल ओढ़ गया
हम तो खिज़ाँ के फूल थे, बता ना
क्यूँ हम को बहारों में छोड़ गया
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