बस हाल रूका और दौड़ गया
फिर वक़्त उसी हाल छोड़ गया
आख़िर सो गया बाग़बाँ मेरा
आख़िर मुझे फिर कोई तोड़ गया
घर लौट जाना था जहाँ से हमें
इस रास्ते का ऐसा मोड़ गया
किस दर्जा बिखर के सुकूँ से था
अब फिर से मुझे कौन जोड़ गया
संजीदगी में रात भर जो हुआ
मैं सुब्ह वही हाल ओढ़ गया
हम तो खिज़ाँ के फूल थे, बता ना
क्यूँ हम को बहारों में छोड़ गया
— pankaj pundir















