Betaab Murtaza

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    अपनी ग़ज़ल में सब ही पाबंदी को निभाता
    शायर न जाने फिर क्यों आज़ादी गुनगुनाता
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    "कश्मकश"
    अजीब कश्मकश में
    मन जिसके वश में
    तरह-तरह के सवाल हैं
    न मिलते जवाब हैं
    सच की तलाश है
    न मिलते जवाब हैं
    किसे कहूँ
    कहाँ जाऊँ
    सुकूँ-ए-दिल कहाँ से लाऊँ
    हाल-ए-दिल न बयाँ किया
    बेताबी में क़लम उठायी लिख लिया
    जैसे ढूँढता है परिंदा अपने अधिकारों को
    वैसे ढूँढ तू भी अपने जवाबों को
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    हर ज़ेहन जो बेसब्री का हंगाम है
    अब सब्र ही यारों बना गुलफ़ाम है
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    मौत तेरा मुक़द्दर यहाँ
    एक दिन क़ब्र ही घर यहाँ

    ख़ूबसूरत महल थे कभी
    अब बने हैं वो बंजर यहाँ

    हो गये ख़ाक वो लोग सब
    थे कभी जिनके लश्कर यहाँ

    मौत सबका मुक़द्दर बना
    फिर हो अकबर या कम-तर यहाँ

    देखते तो सभी हैं मगर
    भूलते मौत अक्सर यहाँ

    यारी नायाब है जान ले
    वो हक़ीक़ी है गौहर यहाँ

    हो मुहब्बत तिरी ज़िंदगी
    बस यहीं उम्दा जौहर यहाँ

    माल तेरा सभी फ़ानी है
    बस मुहब्बत है रहबर यहाँ

    देख ‘बेताब’ तू ग़ौर कर
    मौत जो रोज़ मज़हर यहाँ
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    दुनिया का क्यों शौक़ रखता इतना है
    तू यहाँ क्या लाया क्या ले जाना है

    कितनी भी तू कर मुहब्बत दुनिया से
    वक़्त होने पर यहाँ से चलना है

    किस झमेला में फँसा है तू यहाँ
    ऐ मुसाफ़िर पल का ये अफ़साना है

    जो तू शानों पे अकड़ता अपनी है
    चंद लम्हों का ये बस परवाना है

    छोड़ गुमराही ये अब ‘बेताब’ तू
    देख कितना आरज़ी अफ़साना है
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    हो कहीं तुम यहाँ जब नहीं 

    दिल मिरा ख़ुश रहे तब नहीं 



    जो न बेताब दिल को करे 

    इक हुई ही कभी शब नहीं 


    क्या कभी मैं तुझे भूला हूँ 

    याद तेरी बता कब नहीं 



    ज़िंदगी तो चले है मगर 

    अब लगे ख़ुश कहीं रब नहीं 


    जो ग़म-ए-दिल बयाँ कर सके 

    वो मिरे पास है लब नहीं
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    मैं हूँ जवाब ढूँढ रहा दर-ब-दर यहाँ
    मैं हूँ सवाल पूछ रहा हो निडर यहाँ

    बोले ज़माना बस कहा जो मान ले उसे
    मत पूछ अब सवाल किसी से इधर यहाँ

    झूठी तसल्ली का नहीं क़ायल कभी मैं तो
    हरगिज़ बने न मेरा कभी कोई घर यहाँ

    सब झूठ जो कहे न कभी बन सके वो हक़
    सच्चे जवाब ही से मैं रोकूँ सफ़र यहाँ

    शायद सवाल का न कहीं भी जवाब है
    समझाने पर किधर सुने यह दिल मगर यहाँ
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    "हुसैन"
    मेरे प्यारे बेटे हुसैन
    नहीं है तेरे बिना दिल को चैन
    जब याद आती है तेरी
    आँख भर आती है मेरी
    मुझे तो बहुत थी ख़ुशी तेरे आने की
    क्या थी तुझे इतनी जल्दी जाने की
    इतने मासूम को कभी बीमार देखा न था
    ऐसा भारी जनाज़ा कभी सोचा न था
    जब तू हद से ज़्यादा याद आता है
    तेरा बाप कलम उठा के कुछ लिख लेता है
    ज़माना पूछता है सफ़ेदी का सबब मुँह पर
    कौन जानता है भार तेरे जनाज़े का रूह पर
    शायद बेहतर मक़ाम पर है तू
    तेरी तकलीफ़ों से अमान पर है तू
    बस यही बोलता हूँ
    तेरे माँ के आँसू पोछता हूँ
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    जो न हो तुम यहाँ अब नहीं
    चैन राहत सुकूँ सब नहीं
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    तू नहीं तो यहाँ क्या मज़ा
    बस यहाँ है सज़ा ही सज़ा
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