दुनिया का क्यूँ शौक़ रखता इतना है
तू यहाँ क्या लाया क्या ले जाना है
कितनी भी तू कर मुहब्बत दुनिया से
वक़्त होने पर यहाँ से चलना है
किस झमेला में फँसा है तू यहाँ
ऐ मुसाफ़िर पल का ये अफ़साना है
जो तू शानों पे अकड़ता अपनी है
चंद लम्हों का ये बस परवाना है
छोड़ गुमराही ये अब ‘बेताब’ तू
देख कितना आरज़ी अफ़साना है
— Betaab Murtaza















