ज़िंदगी को अपनी बस यार जीना है मुझ को

फिर हराम हो गरचे जाम पीना है मुझ को

तौर और तरीक़ा जो दुनिया यूँ सिखाती हैं
तौर और तरीक़ों से अब न जीना है मुझ को

दफ़ना कर उसूलों को जाम इल्म का जो यूँ
रोज़ बिकता हैं वो तो अब न पीना है मुझ को

मौज दरिया की मुझ को तकती ही रही जो यूँ
जो बचाता यूँ हर दिन वो सफ़ीना है मुझ को

जाम यूँ मुहब्बत का नोश उस ने करवाके
उस ने ख़ुद ही से ख़ुद को यार छीना है मुझ को

— Betaab Murtaza

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