ज़िंदगी इम्तिहान लगती हैदर्द की दास्तान लगती हैइक सबब बस फ़िराक़ से उस केज़िंदगी ना-तवान लगती हैजो ग़म-ए-दिल बयाँ करूँ मैं तोबे-असर क्यूँ ज़बान लगती हैक्यूँ नहीं भूल पाता हूँ उस कोयाद उस की जहान लगती हैज़िंदगी के यूँ तजरबों से अबहर ख़ुशी बे-निशान लगती है— Betaab Murtaza