जब उसे मिलना हुआ है
वो कहाँ अपना हुआ है
जो न सोचा जा सके वो
ग़म हमें इतना हुआ है
इश्क़ उस से जो हुआ तो
क्या वफ़ा मिलना हुआ है
बाग जो बर्बाद हो तो
क्या कभी खिलना हुआ है
जो यहीं है राह उस की
फिर यहीं रुकना हुआ है
— Betaab Murtaza
वो कहाँ अपना हुआ है
जो न सोचा जा सके वो
ग़म हमें इतना हुआ है
इश्क़ उस से जो हुआ तो
क्या वफ़ा मिलना हुआ है
बाग जो बर्बाद हो तो
क्या कभी खिलना हुआ है
जो यहीं है राह उस की
फिर यहीं रुकना हुआ है
Other ghazal from the same pen
Shers of visaal.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling