aadhi se ziyaada shab-e-gham kaat chuka hoon | आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ

  - Saqib lakhanavi

आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ
अब भी अगर आ जाओ तो ये रात बड़ी है

  - Saqib lakhanavi

Neend Shayari

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    जो पानी न होता तो दरिया न बहते

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    हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते

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    मिरी नाव इस ग़म के दरिया में 'साक़िब'
    किनारे पे आ ही लगी बहते बहते
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    ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था
    हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते
    Saqib lakhanavi
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    Saqib lakhanavi

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